श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  4.9.67 
आत्मानं च प्रवयसमाकलय्य विशाम्पति: ।
वनं विरक्त: प्रातिष्ठद्विमृशन्नात्मनो गतिम् ॥ ६७ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी बढ़ती आयु और अपनी आत्मिक शांति के बारे में सोच-विचारकर राजा उत्तानपाद ने संसार से वैराग्य ले लिया और जंगल में चले गए।
 
अपनी बढ़ती आयु और अपनी आत्मिक शांति के बारे में सोच-विचारकर राजा उत्तानपाद ने संसार से वैराग्य ले लिया और जंगल में चले गए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत नौवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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