श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  4.9.65 
उत्तानपादो राजर्षि: प्रभावं तनयस्य तम् ।
श्रुत्वा दृष्ट्वाद्भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम् ॥ ६५ ॥
 
 
अनुवाद
धर्मिक प्रवृत्ति वाले राजा उत्तानपाद ने जब ध्रुव महाराज के प्रशंसनीय कार्यों के बारे में सुना और स्वयं भी देखा कि वे कितने प्रभावशाली और महान् थे, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए; क्योंकि ध्रुव महाराज के कार्य अत्यंत विस्मयकारी थे।
 
धर्मिक प्रवृत्ति वाले राजा उत्तानपाद ने जब ध्रुव महाराज के प्रशंसनीय कार्यों के बारे में सुना और स्वयं भी देखा कि वे कितने प्रभावशाली और महान् थे, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए; क्योंकि ध्रुव महाराज के कार्य अत्यंत विस्मयकारी थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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