श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  4.9.63 
उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमै: ।
कूजद्विहङ्गमिथुनैर्गायन्मत्तमधुव्रतै: ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
राजा का निवास स्थान बगीचों से घिरा हुआ था, जिसमें स्वर्गीय ग्रहों से लाए गए विभिन्न प्रकार के पेड़ थे। उन पेड़ों पर मीठे गीत गाते पक्षियों के जोड़े और लगभग-पागल भौंरे थे, जो बहुत ही मनभावन मधुर ध्वनि करते थे।
 
राजा का निवास स्थान बगीचों से घिरा हुआ था, जिसमें स्वर्गीय ग्रहों से लाए गए विभिन्न प्रकार के पेड़ थे। उन पेड़ों पर मीठे गीत गाते पक्षियों के जोड़े और लगभग-पागल भौंरे थे, जो बहुत ही मनभावन मधुर ध्वनि करते थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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