श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  4.9.62 
यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।
मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुता: ॥ ६२ ॥
 
 
अनुवाद
राजा का महल संगमरमर की दीवारों से घिरा हुआ था, जिनपर अनमोल मरकत मणियों की नक्काशी की गई थी। इन दीवारों पर सुंदर स्त्रियों जैसी मूर्तियाँ भी बनाई गई थीं, जिनके हाथों में चमकते हुए मणियाँ थीं।
 
राजा का महल संगमरमर की दीवारों से घिरा हुआ था, जिनपर अनमोल मरकत मणियों की नक्काशी की गई थी। इन दीवारों पर सुंदर स्त्रियों जैसी मूर्तियाँ भी बनाई गई थीं, जिनके हाथों में चमकते हुए मणियाँ थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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