महामणिव्रातमये स तस्मिन्भवनोत्तमे ।
लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत् ॥ ६० ॥
अनुवाद
इसके पश्चात ध्रुव महाराज अपने पिता के महल में रहने लगे, जिसकी दीवारें मूल्यवान मणियों से युक्त और अत्यधिक सजावटी थीं। उनके पिता ने उनका विशेष ध्यान रखा और वे उस महल में ठीक उसी तरह रहने लगे जैसे देवतागण अपने स्वर्गलोक के प्रासादों में रहते हैं।
Thereafter Dhruva Maharaja started living in his father's palace, the walls of which were adorned with very precious gems. His loving father took special care of him and he started living in that palace just like the gods live in their palaces in heaven.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)