श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.9.6 
ध्रुव उवाच
योऽन्त: प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधर: स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज ने कहा: हे भगवान, आप सर्वशक्तिमान हैं। आप मेरे हृदय में प्रवेश कर मेरे अंदर सोई हुई सभी इंद्रियों - हाथ, पैर, कान, स्पर्श ज्ञान, जीवन शक्ति और विशेष रूप से मेरी वाणी की शक्ति - को जाग्रत कर दिया है। मैं आपको आदरपूर्वक प्रणाम करता हूं।
 
ध्रुव महाराज ने कहा: हे भगवान, आप सर्वशक्तिमान हैं। आप मेरे हृदय में प्रवेश कर मेरे अंदर सोई हुई सभी इंद्रियों - हाथ, पैर, कान, स्पर्श ज्ञान, जीवन शक्ति और विशेष रूप से मेरी वाणी की शक्ति - को जाग्रत कर दिया है। मैं आपको आदरपूर्वक प्रणाम करता हूं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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