श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  4.9.54 
तत्र तत्रोपसंक्लृप्तैर्लसन्मकरतोरणै: ।
सवृन्दै: कदलीस्तम्भै: पूगपोतैश्च तद्विधै: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
पूरा नगर केले के उन स्तंभों से सजाया गया था जिन पर फूलों और फलों के गुच्छे लटके हुए थे, और इधर-उधर पत्तियों और टहनियों से युक्त सुपारी के पेड़ दिखाई दे रहे थे। ऐसे कई तोरण भी बनाए गए थे जो मगरमच्छ के आकार के थे।
 
पूरा नगर केले के उन स्तंभों से सजाया गया था जिन पर फूलों और फलों के गुच्छे लटके हुए थे, और इधर-उधर पत्तियों और टहनियों से युक्त सुपारी के पेड़ दिखाई दे रहे थे। ऐसे कई तोरण भी बनाए गए थे जो मगरमच्छ के आकार के थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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