श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.9.5 
स वै तदैव प्रतिपादितां गिरं
दैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णय: ।
तं भक्तिभावोऽभ्यगृणादसत्वरं
परिश्रुतोरुश्रवसं ध्रुवक्षिति: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
उस समय ध्रुव महाराज ने वैदिक मत की पूर्णरूपेण समझ प्राप्त की और ईश्वर के साथ उनके साथ ही समस्त जीवों के साथ उनके संबंध को समझ लिया। भगवान की सेवाभक्ति के अनुसार ध्रुव ने, जो की शीघ्र ही एक ऐसा लोक पाने वाले हैं जिसका कभी विनाश नहीं होगा, यहां तक कि प्रलयकाल में भी नहीं, अपनी सोच समझ कर निश्चयात्मक स्तुति की।
 
उस समय ध्रुव महाराज ने वैदिक मत की पूर्णरूपेण समझ प्राप्त की और ईश्वर के साथ उनके साथ ही समस्त जीवों के साथ उनके संबंध को समझ लिया। भगवान की सेवाभक्ति के अनुसार ध्रुव ने, जो की शीघ्र ही एक ऐसा लोक पाने वाले हैं जिसका कभी विनाश नहीं होगा, यहां तक कि प्रलयकाल में भी नहीं, अपनी सोच समझ कर निश्चयात्मक स्तुति की।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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