श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  4.9.47 
यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरि: ।
तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम् ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार प्रकृति के नियमों के अनुसार पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार परमेश्वर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखने वाले व्यक्ति को, जिसके अंदर दिव्य गुण हैं, सभी जीव सम्मान देते हैं।
 
जिस प्रकार प्रकृति के नियमों के अनुसार पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार परमेश्वर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखने वाले व्यक्ति को, जिसके अंदर दिव्य गुण हैं, सभी जीव सम्मान देते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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