श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.9.44 
अथाजिघ्रन्मुहुर्मूर्ध्नि शीतैर्नयनवारिभि: ।
स्‍नापयामास तनयं जातोद्दाममनोरथ: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज से पुनर्मिलन होने से राजा उत्तानपाद की लम्बे समय से चली आ रही इच्छा पूरी हो गई, इस कारण उन्होंने बार-बार ध्रुव का सिर सूंघा और अपने ठंडे आँसुओं की धाराओं से उन्हें नहला डाला।
 
ध्रुव महाराज से पुनर्मिलन होने से राजा उत्तानपाद की लम्बे समय से चली आ रही इच्छा पूरी हो गई, इस कारण उन्होंने बार-बार ध्रुव का सिर सूंघा और अपने ठंडे आँसुओं की धाराओं से उन्हें नहला डाला।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd