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श्लोक 4.9.44  |
अथाजिघ्रन्मुहुर्मूर्ध्नि शीतैर्नयनवारिभि: ।
स्नापयामास तनयं जातोद्दाममनोरथ: ॥ ४४ ॥ |
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| अनुवाद |
| ध्रुव महाराज से पुनर्मिलन होने से राजा उत्तानपाद की लम्बे समय से चली आ रही इच्छा पूरी हो गई, इस कारण उन्होंने बार-बार ध्रुव का सिर सूंघा और अपने ठंडे आँसुओं की धाराओं से उन्हें नहला डाला। |
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| ध्रुव महाराज से पुनर्मिलन होने से राजा उत्तानपाद की लम्बे समय से चली आ रही इच्छा पूरी हो गई, इस कारण उन्होंने बार-बार ध्रुव का सिर सूंघा और अपने ठंडे आँसुओं की धाराओं से उन्हें नहला डाला। |
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