Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 4.9.42-43: राजा उत्तानपाद ने ध्रुव महाराज को पास के एक वन में आते हुए देखकर झट से अपने रथ से उतर गए। वे बहुत समय से अपने बेटे ध्रुव को देखने के लिए उत्सुक थे, इसलिए बड़े प्यार और स्नेह से अपने लंबे समय से बिछड़े बेटे को गले लगाने के लिए आगे बढ़े। गहरी साँस लेते हुए, राजा ने उन्हें दोनों बाहों में भर लिया। लेकिन ध्रुव महाराज पहले जैसे नहीं थे; भगवान के चरणकमलों के स्पर्श से आध्यात्मिक उन्नति होने के कारण वे पूरी तरह से पवित्र हो चुके थे। | bhagavat अध्याय 4.9: ध्रुव महाराज का घर लौटना । bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
राजा उत्तानपाद ने ध्रुव महाराज को पास के एक वन में आते हुए देखकर झट से अपने रथ से उतर गए। वे बहुत समय से अपने बेटे ध्रुव को देखने के लिए उत्सुक थे, इसलिए बड़े प्यार और स्नेह से अपने लंबे समय से बिछड़े बेटे को गले लगाने के लिए आगे बढ़े। गहरी साँस लेते हुए, राजा ने उन्हें दोनों बाहों में भर लिया। लेकिन ध्रुव महाराज पहले जैसे नहीं थे; भगवान के चरणकमलों के स्पर्श से आध्यात्मिक उन्नति होने के कारण वे पूरी तरह से पवित्र हो चुके थे।
When King Uttānapāda saw Dhruva Mahārāja approach a grove, he immediately got down from his chariot. He had been very eager to see his son Dhruva for a long time, so out of great love he went forward to embrace his long-lost son. The King took him in his arms, taking deep breaths. But Dhruva Mahārāja was not the same as before; he had become completely pure by the spiritual advancement he had received by the touch of the Lord's lotus feet.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥