श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.9.33 
दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नद‍ृक् ।
तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज ने पश्चात्ताप करते हुए कहा कि मैं मायावश था; वास्तविकता से अनजान होने के कारण मैं उसकी गोद में सोया रहा। द्वैत दृष्टि के चलते मैं अपने भाई को शत्रु मानता रहा और झूठे ही यह सोचकर मन ही मन पश्चात्ताप करता रहा कि वे मेरे शत्रु हैं।
 
ध्रुव महाराज ने पश्चात्ताप करते हुए कहा कि मैं मायावश था; वास्तविकता से अनजान होने के कारण मैं उसकी गोद में सोया रहा। द्वैत दृष्टि के चलते मैं अपने भाई को शत्रु मानता रहा और झूठे ही यह सोचकर मन ही मन पश्चात्ताप करता रहा कि वे मेरे शत्रु हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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