श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.9.32 
मतिर्विदूषिता देवै: पतद्‌भिरसहिष्णुभि: ।
यो नारदवचस्तथ्यं नाग्राहिषमसत्तम: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि उच्च लोकों में स्थित सभी देवताओं को दोबारा नीचे आना पड़ेगा, इसलिए भक्ति द्वारा वैकुण्ठलोक प्राप्त करने के मेरे प्रयास पर वे सभी ईर्ष्या करते हैं। इन असहिष्णु देवताओं ने मेरी बुद्धि नष्ट कर दी है और एकमात्र इसी कारण से मैं नारदमुनि के उपदेशों का असली आशीर्वाद स्वीकार नहीं कर सका!
 
चूँकि उच्च लोकों में स्थित सभी देवताओं को दोबारा नीचे आना पड़ेगा, इसलिए भक्ति द्वारा वैकुण्ठलोक प्राप्त करने के मेरे प्रयास पर वे सभी ईर्ष्या करते हैं। इन असहिष्णु देवताओं ने मेरी बुद्धि नष्ट कर दी है और एकमात्र इसी कारण से मैं नारदमुनि के उपदेशों का असली आशीर्वाद स्वीकार नहीं कर सका!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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