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श्लोक 4.9.28  |
विदुर उवाच
सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-
र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् ।
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना
कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥ २८ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्री विदुर ने पूछा: हे ब्राह्मण, भगवान का धाम प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि अत्यन्त वत्सल और कृपालु भगवान केवल उसी से ही प्रसन्न होते हैं। ध्रुव महाराज ने इस पद को एक ही जीवन में प्राप्त कर लिया और वे थे भी बहुत ही बुद्धिमान और विवेकी। तो फिर भी वे प्रसन्न क्यों नहीं थे? |
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| श्री विदुर ने पूछा: हे ब्राह्मण, भगवान का धाम प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि अत्यन्त वत्सल और कृपालु भगवान केवल उसी से ही प्रसन्न होते हैं। ध्रुव महाराज ने इस पद को एक ही जीवन में प्राप्त कर लिया और वे थे भी बहुत ही बुद्धिमान और विवेकी। तो फिर भी वे प्रसन्न क्यों नहीं थे? |
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