श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.9.28 
विदुर उवाच
सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-
र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् ।
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना
कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
श्री विदुर ने पूछा: हे ब्राह्मण, भगवान का धाम प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि अत्यन्त वत्सल और कृपालु भगवान केवल उसी से ही प्रसन्न होते हैं। ध्रुव महाराज ने इस पद को एक ही जीवन में प्राप्त कर लिया और वे थे भी बहुत ही बुद्धिमान और विवेकी। तो फिर भी वे प्रसन्न क्यों नहीं थे?
 
Sri Vidura asked: O Brahmin, it is very difficult to attain the abode of the Lord. It can be attained only by pure devotion, because the very affectionate and kind Lord is pleased only by that. Dhruva Maharaja attained this position in one lifetime and he was also very intelligent and prudent. Then why was he not pleased?
तात्पर्य
संत विदुर का प्रश्न अति प्रासंगिक है। अर्थ-वित् शब्द, जो वास्तविकता और असत्य के बीच भेद करने की क्षमता को दर्शाता है, इस प्रसंग में बहुत महत्वपूर्ण है। एक अर्थ-वित् को परमहंस भी कहा जाता है। एक परमहंस प्रत्येक वस्तु के केवल सक्रिय सिद्धांत को स्वीकार करता है। जिस प्रकार हंस जल और दूध के मिश्रण में से केवल दूध को ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार एक परमहंस, केवल भगवान के परम व्यक्तित्व को ही अपने जीवन और आत्मा के रूप में ग्रहण करता है और वह सभी बाहरी भौतिक चीजों की उपेक्षा करता है। ध्रुव महाराज इस श्रेणी में थे और अपने दृढ़ संकल्प के कारण उन्होंने अपने वांछित परिणाम को प्राप्त किया, लेकिन फिर भी, जब वे घर लौटे तो वे बहुत प्रसन्न नहीं थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)