या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म
ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्
किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥ १० ॥
अनुवाद
हे भगवान, आपके चरण कमलों के ध्यान से या निष्कलंक भक्तों से आपके महिमा का श्रवण करने से जो दिव्य आनंद प्राप्त होता है, वह ब्रह्मानंद अवस्था से कहीं ज्यादा है। ब्रह्मानंद में मनुष्य स्वयं को निर्गुण ब्रह्म के साथ एकीकृत मानता है। चूंकि ब्रह्मानंद भी भक्ति से मिलने वाले दिव्य आनंद से परास्त हो जाता है, तो स्वर्ग तक पहुंचने वाले उस अस्थायी आनंद की क्या बात करें, जो काल की तलवार से नष्ट हो जाता है? भले ही कोई स्वर्ग क्यों न पहुँच जाए, काल के साथ वह नीचे गिर जाता है।
O Lord, the transcendental bliss that one gets by meditating on Your feet or by hearing Your glories from pure devotees is far superior to the state of Brahmananda in which one thinks of himself as one with the Nirguna Brahman. Since even Brahmananda is defeated by the transcendental bliss that one gets from devotion, what to say of that momentary bliss in which one reaches heaven and which is destroyed by the sword of time? Even if one rises to heaven, in course of time one falls down.
तात्पर्य
भगवद्भक्ति की साधना से प्राप्त आनंद श्रवणम कीर्तनम् से, श्रवण व कीर्तन से, जो भगवद्भक्ति के प्राथमिक अंग है, उसे किसी प्रकार स्वर्गलोक पर आरूहण करने वाले कर्मिओ के सुखों से अथवा ज्ञानियों व योगियों, जो निराकार ब्रह्म के साथ एकत्व का आनंद लेते हैं, के सुखों से तुलना नहीं की जा सकती। योगी साधारणतः भगवान् विष्णु के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं, लेकिन भक्त न केवल उनके ध्यान में रहते हैं बल्कि भगवान् की प्रत्यक्ष सेवा में संलग्न रहते हैं। पिछले श्लोक में हमें "भवप्यय" शब्दावली मिलती है, जो जन्म व मृत्यु का उल्लेख करती है। भगवान् उस जन्म व मृत्यु के चक्र से मुक्ति दे सकते हैं। यह सोचना कि जब कोई जन्म व मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त होता है तो वह परब्रह्म में विलीन हो जाता है, जैसा कि अद्वैतवादी सोचते हैं, गलतफहमी है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि निष्कपट भक्तों की श्रवणम कीर्तनम् साधना से प्राप्त आनंदवाद ब्रह्मानंद से तुलना नहीं की जा सकती, जो कि परब्रह्म में विलीन होने से प्राप्त निराकार आनंदवाद की संकल्पना है। कर्मियों की स्थिति और भी निम्न है। उनका लक्ष्य स्वयं को उच्च ग्रहों में स्थापित करना है। यह कहा जाता है, "यांति देव-व्रता देवान्"। देवताओं की पूजा करने वाले व्यक्ति स्वर्गलोक पर आरूण होते हैं (भ.गी. 9.25)। लेकिन भगवद्गीता (9.21) में कहीं और कहा गया है, "क्षीणे पुण्ये मर्त्य-लोकम् विशन्ति"। वे लोग जो उच्च ग्रहों पर आरुण किये जाते हैं उन्हें जब उनके पुण्यकर्मों का फल समाप्त हो जाता है तो उन्हें वापस आना पड़ता है। वे उन अंतरिक्ष यात्रियों जैसे हैं जो चन्द्रमा पर जाते हैं। जैसे ही उनका ईंधन खत्म होता है, वे वापस इस पृथ्वी पर आने के लिए बाध्य होते हैं। आधुनिक अंतरिक्ष यात्री जो रॉकेट की शक्ति से चन्द्रमा या अन्य ग्रहों पर जाते हैं, उन्हें वापस आना पड़ता है अपने ईंधन को समाप्त करने के बाद, उसी प्रकार वे भी जो यज्ञों व पुण्यकर्मों के बल से स्वर्गलोक पर आरुण किये जाते हैं। अंतकासि-लुलितात से: समय की तलवार से इस भौतिक दुनिया में अपने ऊंचे स्थान से काट दिए जाते हैं, और वे वापस निचे आ जाते हैं। ध्रुव महाराज ने माना कि भगवान की भक्ति का परिणाम परम निराकार में विलीन होने या स्वर्गलोक पर आरुण करने की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है। "पततां विमानात" शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। विमान का अर्थ "हवाई जहाज" है। जो लोग स्वर्गलोक पर आरूण किये जाते हैं वे हवाई जहाज जैसे है, जो अपने ईंधन के समाप्त होने पर गिर जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)