श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.9.1 
मैत्रेय उवाच
त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे
कृतावनामा: प्रययुस्त्रिविष्टपम् ।
सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता
मधोर्वनं भृत्यदिद‍ृक्षया गत: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा: जब भगवान् ने देवताओं को इस प्रकार फिर से आश्वासन दिया तो वे समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो गए और वे सब उन्हें नमस्कार करके अपने-अपने देवलोकों को चले गए। तब भगवान, जो साक्षात सहस्रशीर्ष अवतार हैं, गरुड़ पर सवार होकर अपने दास ध्रुव को देखने के लिए मधुवन गए।
 
महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा: जब भगवान् ने देवताओं को इस प्रकार फिर से आश्वासन दिया तो वे समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो गए और वे सब उन्हें नमस्कार करके अपने-अपने देवलोकों को चले गए। तब भगवान, जो साक्षात सहस्रशीर्ष अवतार हैं, गरुड़ पर सवार होकर अपने दास ध्रुव को देखने के लिए मधुवन गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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