श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  4.8.82 
श्रीभगवानुवाच
मा भैष्ट बालं तपसो दुरत्यया-
न्निवर्तयिष्ये प्रतियात स्वधाम ।
यतो हि व: प्राणनिरोध आसी-
दौत्तानपादिर्मयि सङ्गतात्मा ॥ ८२ ॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान ने उत्तर दिया: हे देवगण! तुम लोग इस घटना से चिंतित मत हो। यह राजा उत्तानपाद के पुत्र की कठोर तपस्या और पूरे दृढ़ विश्वास के कारण हुआ है, जो इस समय मेरे ध्यान में समाहित है। उसने सारे संसार की श्वास क्रिया को रोक दिया है। तुम सब अपने घरों में सुरक्षित जा सकते हो। मैं उस बालक को कठिन तपस्या करने से रोक दूँगा, तो तुम लोग इस स्थिति से बच जाओगे।
 
श्री भगवान ने उत्तर दिया: हे देवगण! तुम लोग इस घटना से चिंतित मत हो। यह राजा उत्तानपाद के पुत्र की कठोर तपस्या और पूरे दृढ़ विश्वास के कारण हुआ है, जो इस समय मेरे ध्यान में समाहित है। उसने सारे संसार की श्वास क्रिया को रोक दिया है। तुम सब अपने घरों में सुरक्षित जा सकते हो। मैं उस बालक को कठिन तपस्या करने से रोक दूँगा, तो तुम लोग इस स्थिति से बच जाओगे।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत आठवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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