श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  4.8.80 
तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो
द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया ।
लोका निरुच्छ्‌वासनिपीडिता भृशं
सलोकपाला: शरणं ययुर्हरिम् ॥ ८० ॥
 
 
अनुवाद
जब ध्रुव महाराज भगवान विष्णु के साथ एकाकार हो गए, तो उनकी पूरी तरह से केंद्रित चेतना और शरीर के सभी छिद्रों के बंद होने के कारण, सारे विश्व की साँस घुटने लगी और सभी लोकों के सभी महान देवताओं को सांस लेने में परेशानी हुई। इसलिए, वे भगवान् की शरण में आ गए।
 
जब ध्रुव महाराज भगवान विष्णु के साथ एकाकार हो गए, तो उनकी पूरी तरह से केंद्रित चेतना और शरीर के सभी छिद्रों के बंद होने के कारण, सारे विश्व की साँस घुटने लगी और सभी लोकों के सभी महान देवताओं को सांस लेने में परेशानी हुई। इसलिए, वे भगवान् की शरण में आ गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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