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श्लोक 4.8.75  |
चतुर्थमपि वै मासं द्वादशे द्वादशेऽहनि ।
वायुभक्षो जितश्वासो ध्यायन्देवमधारयत् ॥ ७५ ॥ |
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| अनुवाद |
| चौथे महीने में ध्रुव महाराज ने प्राणायाम में महारथ हासिल कर ली और इस तरह हर बारहवें दिन ही साँस ली। इस तरह वो अपने स्थान पर पूर्ण रूप से स्थिर हो गए और उन्होंने भगवान की पूजा की। |
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| चौथे महीने में ध्रुव महाराज ने प्राणायाम में महारथ हासिल कर ली और इस तरह हर बारहवें दिन ही साँस ली। इस तरह वो अपने स्थान पर पूर्ण रूप से स्थिर हो गए और उन्होंने भगवान की पूजा की। |
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