श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  4.8.69 
सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभु: ।
ऐष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ६९ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिय राजन्, तुम्हारे पुत्र में अद्भुत क्षमताएँ हैं। वह ऐसे काम कर दिखाएगा जो महान राजाओं और साधुओं के लिए भी असंभव हैं। शीघ्र ही वह अपना कार्य पूरा करके घर वापस आ जाएगा। तुम यह भी जान लो कि वह तुम्हारे नाम और यश को सारे संसार में फैलाएगा।
 
O King, your son is very capable. He will do such deeds that even great kings and sages cannot do. He will soon complete his work and return home. You should also know that he will spread your fame all over the world.
तात्पर्य
यहाँ इस श्लोक में नारद मुनि ने ध्रुव महाराज को प्रभु कहा है। यह शब्द परम पुरुषोत्तम भगवान के लिए है। कई बार आध्यात्मिक गुरु को प्रभुपाद संबोधित किया जाता है। प्रभु का अर्थ है "परम पुरुषोत्तम भगवान" और पाँद का अर्थ है "पद" वैष्णव दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक गुरु परम पुरुषोत्तम भगवान के पद पर प्रतिष्ठित हैं या दूसरे शब्दों में वो परमेश्वर के प्रमाणिक प्रतिनिधि हैं। ध्रुव महाराज का भी यहाँ प्रभु वर्णन है क्योंकि वो वैष्णव मत के आचार्य हैं। प्रभु का एक और अर्थ है "इन्द्रियों पर विजय", जैसे शब्द स्वामी का अर्थ है। एक और महत्वपूर्ण शब्द है सुदुष्कर, "करने में अत्यंत कठिन"। ध्रुव महाराज ने कौन सा कार्य किया? जीवन का सबसे कठिन कार्य है परम पुरुषोत्तम भगवान को संतुष्ट करना और ध्रुव महाराज यह कर सकते थे। हमें याद रखना चाहिए कि ध्रुव महाराज चंचल नहीं थे, वो अपनी सेवा पूरी करने के बाद ही वापस आना चाहते थे। इसलिए प्रत्येक भक्त को यह निश्चिय करना चाहिए कि इस जीवन में वो परम पुरुषोत्तम भगवान को संतुष्ट कर सकते हैं और इस प्रक्रिया के द्वारा वापस अपने घर, वापस भगवान के पास जा सकते हैं। यही जीवन के सर्वश्रेष्ठ मिशन की पूर्णता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)