श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  4.8.68 
नारद उवाच
मा मा शुच: स्वतनयं देवगुप्तं विशाम्पते ।
तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् ॥ ६८ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि नारद ने उत्तर दिया: हे राजन्, अपने पुत्र को लेकर शोक न करो। वह भगवान की कृपा से पूर्ण रूप से रक्षित है। यद्यपि उसके प्रभाव के बारे में तुम्हें यथार्थ जानकारी नहीं है, फिर भी उसकी कीर्ति संसार भर में फैल चुकी है।
 
महर्षि नारद ने उत्तर दिया: हे राजन्, अपने पुत्र को लेकर शोक न करो। वह भगवान की कृपा से पूर्ण रूप से रक्षित है। यद्यपि उसके प्रभाव के बारे में तुम्हें यथार्थ जानकारी नहीं है, फिर भी उसकी कीर्ति संसार भर में फैल चुकी है।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd