श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  4.8.58 
परिचर्या भगवतो यावत्य: पूर्वसेविता: ।
ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्‍ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्व भक्तों के पद चिह्नों पर चलकर मनुष्य को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की पूजा करने के लिए बताये गये सामग्रियों को किस तरह से व्यवस्थित करना चाहिए या फिर हृदय में ही मंत्रों का उच्चारण करके भगवान् की पूजा करनी चाहिए जो मंत्रों से भिन्न नहीं हैं।
 
पूर्व भक्तों के पद चिह्नों पर चलकर मनुष्य को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की पूजा करने के लिए बताये गये सामग्रियों को किस तरह से व्यवस्थित करना चाहिए या फिर हृदय में ही मंत्रों का उच्चारण करके भगवान् की पूजा करनी चाहिए जो मंत्रों से भिन्न नहीं हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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