| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन » श्लोक 56 |
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| | | | श्लोक 4.8.56  | लब्ध्वा द्रव्यमयीमर्चां क्षित्यम्ब्वादिषु वार्चयेत् ।
आभृतात्मा मुनि: शान्तो यतवाङ्मितवन्यभुक् ॥ ५६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | यदि सम्भव हो तो मिट्टी, लकड़ी, गूदे और धातु जैसे भौतिक तत्वों से बनी भगवान् की मूर्ति पूजी जा सकती है। जंगल में मिट्टी तथा जल से मूर्ति बनाई जा सकती है और उसे ऊपर बताए नियमों के अनुसार पूजा जा सकती है। जो भक्त अपने ऊपर पूर्ण संयम रखता है, उसे अत्यन्त नम्र तथा शान्त होना चाहिए। जंगल में जो फल तथा सब्जियाँ प्राप्त हों, उन्हें ही खाकर संतुष्ट रहना चाहिए। | | | | यदि सम्भव हो तो मिट्टी, लकड़ी, गूदे और धातु जैसे भौतिक तत्वों से बनी भगवान् की मूर्ति पूजी जा सकती है। जंगल में मिट्टी तथा जल से मूर्ति बनाई जा सकती है और उसे ऊपर बताए नियमों के अनुसार पूजा जा सकती है। जो भक्त अपने ऊपर पूर्ण संयम रखता है, उसे अत्यन्त नम्र तथा शान्त होना चाहिए। जंगल में जो फल तथा सब्जियाँ प्राप्त हों, उन्हें ही खाकर संतुष्ट रहना चाहिए। | | ✨ ai-generated | | |
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