श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  4.8.51 
स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम् ।
नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान सदैव मुस्कराते रहते हैं और भक्तों को सदा इसी रूप में उनका दर्शन करना चाहिए, क्योंकि वे भक्तों पर कृपा करके देखते हैं। इस प्रकार ध्यान लगाने वाले को चाहिए कि वह सब कुछ देने वाले परमात्मा की ओर निहारता रहे।
 
भगवान सदैव मुस्कराते रहते हैं और भक्तों को सदा इसी रूप में उनका दर्शन करना चाहिए, क्योंकि वे भक्तों पर कृपा करके देखते हैं। इस प्रकार ध्यान लगाने वाले को चाहिए कि वह सब कुछ देने वाले परमात्मा की ओर निहारता रहे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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