श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.8.50 
पद्‌भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्‌भ्यां समर्चताम् ।
हृत्पद्मकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
वास्तविक योगी भगवान के उस परम दिव्य रूप का ध्यान करते हैं, जहाँ वे उनके हृदय रूपी कमल के पुंज में खड़े रहते हैं और उनके चरण कमलों के मणियों जैसे नाखून चमकते रहते हैं।
 
A true Yogi meditates on the transcendental form of the Lord standing in the lotus-like mass of his heart, with the gem-like nails of His lotus feet shining.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)