श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.8.43 
स्‍नात्वानुसवनं तस्मिन् कालिन्द्या: सलिले शिवे ।
कृत्वोचितानि निवसन्नात्मन: कल्पितासन: ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने निर्देश दिया : हे बालक, कालिन्दी के नाम से जानी जाने वाली यमुना नदी के जल में प्रतिदिन तीन बार स्नान कर क्योंकि वह जल अत्यंत शुभ, पवित्र और स्वच्छ है। स्नान करने के पश्चात अष्टांग योग के आवश्यक अनुशासनों का पालन कर और उसके बाद एक शांत और स्थिर अवस्था में अपने आसन पर बैठ जा।
 
नारद मुनि ने निर्देश दिया : हे बालक, कालिन्दी के नाम से जानी जाने वाली यमुना नदी के जल में प्रतिदिन तीन बार स्नान कर क्योंकि वह जल अत्यंत शुभ, पवित्र और स्वच्छ है। स्नान करने के पश्चात अष्टांग योग के आवश्यक अनुशासनों का पालन कर और उसके बाद एक शांत और स्थिर अवस्था में अपने आसन पर बैठ जा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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