| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन » श्लोक 42 |
|
| | | | श्लोक 4.8.42  | तत्तात गच्छ भद्रं ते यमुनायास्तटं शुचि ।
पुण्यं मधुवनं यत्र सान्निध्यं नित्यदा हरे: ॥ ४२ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे पुत्र, तुम्हारा सर्वथा कल्याण हो। तुम यमुना नदी के किनारे जाओ, जहाँ प्रसिद्ध तपोवन मधुवन है और वहीं पवित्र हो। वहाँ जाकर मनुष्य स्वयं वृन्दावन में स्थित भगवान् के और अधिक निकट पहुँचता है। | | | | हे पुत्र, तुम्हारा सर्वथा कल्याण हो। तुम यमुना नदी के किनारे जाओ, जहाँ प्रसिद्ध तपोवन मधुवन है और वहीं पवित्र हो। वहाँ जाकर मनुष्य स्वयं वृन्दावन में स्थित भगवान् के और अधिक निकट पहुँचता है। | | ✨ ai-generated | | |
|
|