श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.8.40 
नारद उवाच
जनन्याभिहित: पन्था: स वै नि:श्रेयसस्य ते ।
भगवान् वासुदेवस्तं भज तं प्रवणात्मना ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि नारद ने ध्रुव महाराज से कहा : तुम्हारी माता सुनीति ने जो उपदेश दिया है, वो भगवान की भक्ति के पथ का अनुसरण करने के लिए, तुम्हारे लिए बिल्कुल उपयुक्त है। इसलिए, तुम्हें भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन हो जाना चाहिए।
 
महान ऋषि नारद ने ध्रुव महाराज से कहा : तुम्हारी माता सुनीति ने जो उपदेश दिया है, वो भगवान की भक्ति के पथ का अनुसरण करने के लिए, तुम्हारे लिए बिल्कुल उपयुक्त है। इसलिए, तुम्हें भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन हो जाना चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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