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श्लोक 4.8.29  |
परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुष: ।
दैवोपसादितं यावद्वीक्ष्येश्वरगतिं बुध: ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान की लीला अत्यंत विचित्र है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इस लीला को स्वीकार करे और अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी भगवान की इच्छा से सम्मुख आए, उससे संतुष्ट रहे। |
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| भगवान की लीला अत्यंत विचित्र है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इस लीला को स्वीकार करे और अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी भगवान की इच्छा से सम्मुख आए, उससे संतुष्ट रहे। |
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