श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.8.29 
परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुष: ।
दैवोपसादितं यावद्वीक्ष्येश्वरगतिं बुध: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान की लीला अत्यंत विचित्र है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इस लीला को स्वीकार करे और अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी भगवान की इच्छा से सम्मुख आए, उससे संतुष्ट रहे।
 
भगवान की लीला अत्यंत विचित्र है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इस लीला को स्वीकार करे और अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी भगवान की इच्छा से सम्मुख आए, उससे संतुष्ट रहे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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