श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.8.28 
विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसन्तोषहेतव: ।
पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोके निजकर्मभि: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे ध्रुव, यदि तुम समझते हो कि तुम्हारे आत्म-सम्मान को चोट पहुँची है, तो भी तुम्हें असंतुष्ट होने का कोई कारण नहीं है। यह असंतोष माया का ही एक अन्य लक्षण है; प्रत्येक जीव अपने पूर्वकर्मों के अनुसार नियंत्रित होता है, इसलिए सुख और दुख भोगने के लिए विभिन्न प्रकार के जीवन होते हैं।
 
हे ध्रुव, यदि तुम समझते हो कि तुम्हारे आत्म-सम्मान को चोट पहुँची है, तो भी तुम्हें असंतुष्ट होने का कोई कारण नहीं है। यह असंतोष माया का ही एक अन्य लक्षण है; प्रत्येक जीव अपने पूर्वकर्मों के अनुसार नियंत्रित होता है, इसलिए सुख और दुख भोगने के लिए विभिन्न प्रकार के जीवन होते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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