| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन » श्लोक 26 |
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| | | | श्लोक 4.8.26  | अहो तेज: क्षत्रियाणां मानभङ्गममृष्यताम् ।
बालोऽप्ययं हृदा धत्ते यत्समातुरसद्वच: ॥ २६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | देखो! बलशाली क्षत्रिय कितने तेजस्वी होते हैं! वे तनिक भी अपनी प्रतिष्ठा के खंडन को बर्दाश्त नहीं कर सकते। जरा सोचो, यह तो एक नन्हा-सा बालक है, फिर भी उसकी सौतेली माँ के कड़वे वचन उसके लिए असहनीय हो गए। | | | | देखो! बलशाली क्षत्रिय कितने तेजस्वी होते हैं! वे तनिक भी अपनी प्रतिष्ठा के खंडन को बर्दाश्त नहीं कर सकते। जरा सोचो, यह तो एक नन्हा-सा बालक है, फिर भी उसकी सौतेली माँ के कड़वे वचन उसके लिए असहनीय हो गए। | | ✨ ai-generated | | |
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