श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.8.24 
मैत्रेय उवाच
एवं सञ्जल्पितं मातुराकर्ण्यार्थागमं वच: ।
सन्नियम्यात्मनात्मानं निश्चक्राम पितु: पुरात् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज की माता सुनीति का उपदेश वस्तुत: उनके मनोवांछित लक्ष्य को पूरा करने के लिए था। इसलिए उन्होंने ज्ञानपूर्वक तथा दृढ़ संकल्प के साथ अपने पिता के घर को त्याग दिया।
 
ध्रुव महाराज की माता सुनीति का उपदेश वस्तुत: उनके मनोवांछित लक्ष्य को पूरा करने के लिए था। इसलिए उन्होंने ज्ञानपूर्वक तथा दृढ़ संकल्प के साथ अपने पिता के घर को त्याग दिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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