श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.8.23 
नान्यं तत: पद्मपलाशलोचनाद्
दु:खच्छिदं ते मृगयामि कञ्चन ।
यो मृग्यते हस्तगृहीतपद्मया
श्रियेतरैरङ्ग विमृग्यमाणया ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिय ध्रुव, कमल-दल सदृश नेत्रों वाले भगवान के अतिरिक्त मुझे कोई ऐसा नहीं दिखता जो तुम्हारे दुखों को कम कर सके। ब्रह्मा जैसे अनेक देवता लक्ष्मी देवी को प्रसन्न करने के लिए लालायित रहते हैं, किन्तु स्वयं लक्ष्मी जी हाथ में कमल पुष्प लिए परमेश्वर की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।
 
हे प्रिय ध्रुव, कमल-दल सदृश नेत्रों वाले भगवान के अतिरिक्त मुझे कोई ऐसा नहीं दिखता जो तुम्हारे दुखों को कम कर सके। ब्रह्मा जैसे अनेक देवता लक्ष्मी देवी को प्रसन्न करने के लिए लालायित रहते हैं, किन्तु स्वयं लक्ष्मी जी हाथ में कमल पुष्प लिए परमेश्वर की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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