श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.8.15 
तं नि:श्वसन्तं स्फुरिताधरोष्ठं
सुनीतिरुत्सङ्ग उदूह्य बालम् ।
निशम्य तत्पौरमुखान्नितान्तं
सा विव्यथे यद्गदितं सपत्‍न्या ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जब ध्रुव महाराज अपनी माँ के पास पहुँचे, तो उनके होठ गुस्से से थरथरा रहे थे और वो बहुत जोर-जोर से रो रहे थे। रानी सुनीति ने तुरंत अपने लाडले को गोद में उठा लिया और महल के निवासियों ने सुरुचि के कड़वे वचनों के बारे में विस्तार से बताया। इससे सुनीति भी बहुत दुखी हुईं।
 
जब ध्रुव महाराज अपनी माँ के पास पहुँचे, तो उनके होठ गुस्से से थरथरा रहे थे और वो बहुत जोर-जोर से रो रहे थे। रानी सुनीति ने तुरंत अपने लाडले को गोद में उठा लिया और महल के निवासियों ने सुरुचि के कड़वे वचनों के बारे में विस्तार से बताया। इससे सुनीति भी बहुत दुखी हुईं।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas