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bhagavat 4.8.14: मैत्रेय मुनि ने कहा: हे विदुर, जैसे लकड़ी से मारा गया साँप फुफकारता है, वैसे ही ध्रुव महाराज अपनी सौतेली माँ के कठोर शब्दों से आहत होकर क्रोध में तेजी से साँस लेने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनके पिता चुप हैं और विरोध नहीं कर रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत महल छोड़ दिया और अपनी माँ के पास चले गए।   |   bhagavat अध्याय 4.8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.8.14 
मैत्रेय उवाच
मातु: सपत्‍न्या: स दुरुक्तिविद्ध:
श्वसन् रुषा दण्डहतो यथाहि: ।
हित्वा मिषन्तं पितरं सन्नवाचं
जगाम मातु: प्ररुदन् सकाशम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय मुनि ने कहा: हे विदुर, जैसे लकड़ी से मारा गया साँप फुफकारता है, वैसे ही ध्रुव महाराज अपनी सौतेली माँ के कठोर शब्दों से आहत होकर क्रोध में तेजी से साँस लेने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनके पिता चुप हैं और विरोध नहीं कर रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत महल छोड़ दिया और अपनी माँ के पास चले गए।
 
Maitreya Muni continued: O Vidura, just as a snake struck with a stick hisses, Dhruva Maharaja, hurt by the harsh words of his stepmother, began breathing heavily in anger. When he saw that his father was silent and did not retort, he immediately left that place and went to his mother.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)