श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.8.12 
बालोऽसि बत नात्मानमन्यस्त्रीगर्भसम्भृतम् ।
नूनं वेद भवान् यस्य दुर्लभेऽर्थे मनोरथ: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
बेटे, तुम्हें पता नहीं कि तुम मेरी कोख से नहीं, बल्कि दूसरी स्त्री के गर्भ से पैदा हुए हो। इसलिए तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है। तुम ऐसी इच्छा को पूरा करने की कोशिश कर रहे हो जो कभी भी पूरी नहीं हो सकती।
 
बेटे, तुम्हें पता नहीं कि तुम मेरी कोख से नहीं, बल्कि दूसरी स्त्री के गर्भ से पैदा हुए हो। इसलिए तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है। तुम ऐसी इच्छा को पूरा करने की कोशिश कर रहे हो जो कभी भी पूरी नहीं हो सकती।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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