श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.8.11 
न वत्स नृपतेर्धिष्ण्यं भवानारोढुमर्हति ।
न गृहीतो मया यत्त्वं कुक्षावपि नृपात्मज: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
सुरुचि ने ध्रुव महाराज से कहा: हे बालक, तुम राजा की गोद या सिंहासन पर बैठने के अधिकारी नहीं हो। इसमें कोई शंका नहीं कि तुम भी राजा के पुत्र हो, परन्तु तुम मेरी कोख से नहीं जन्मे हो, इसीलिए तुम अपने पिता की गोद में बैठने के योग्य नहीं हो।
 
Suruci said to Dhruva Maharaja: O child, you are not fit to sit on the king's lap or throne. Of course, you are also the king's son, but you are not born from my womb, so you are not fit to sit on your father's lap.
तात्पर्य
रानी सुरुचि ने ध्रुव महाराजा को बड़े गर्व से बताया कि राजपुत्र होना ही राजा की गोद या सिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं होता है। वरन, यह श्रेय मेरी कोख से उत्पन्न होने पर निर्भर है। अर्थात उन्होंने ध्रुव महाराजा को परोक्ष रूप से जता दिया कि यद्यपि आपका जन्म तो राजा से हुआ है, किन्तु अन्य रानी की कोख से होने के कारण आप एक नाजायज पुत्र समझे जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)