तथा चिकीर्षमाणं तं सपत्न्यास्तनयं ध्रुवम् ।
सुरुचि: शृण्वतो राज्ञ: सेर्ष्यमाहातिगर्विता ॥ १० ॥
अनुवाद
जब ध्रुव महाराज, जो एक बालक थे, अपने पिता की गोद में जाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब उनकी विमाता सुरुचि को उस बालक से बहुत ईर्ष्या हुई। उसने अत्यंत घमंड के साथ इस प्रकार बोलना प्रारंभ किया जिससे राजा भी सुन सकें।
When the child Dhruva Maharaja was trying to go to his father's lap, his stepmother Suruchi became very jealous of the child and she began speaking very arrogantly so that the king could hear.
तात्पर्य
अवश्य ही, राजा दोनों पुत्रों उत्तम तथा ध्रुव से समान रूप से प्रेम करते थे, अतः उनका स्वाभाविक झुकाव था कि वे उत्तम के साथ-साथ ध्रुव को भी अपनी गोद में बिठाएँ। पर अपनी रानी सुरुचि के प्रति पक्षपातवश वे अपने भावों के होते हुए भी ध्रुव महाराज का स्वागत नहीं कर पाते थे। राजा उत्तानपाद की भावना सुरुचि समझ गई, अतः बड़े अभिमान से वह राजा के स्नेह के विषय में कहने लगी। स्त्री जाति की प्रकृति यह है कि यदि स्त्री जानती है कि उसका पति उसे प्रिय और अपनी विशेष प्रेमिका समझता है, तो वह अनुचित लाभ उठाती है। ऐसे लक्षण स्वायंभुव मनु के परिवार जैसे समुन्नत समाज में भी दृष्य हैं। अतः निष्कर्ष लिया जाता है कि स्त्रियों की प्रकृति स्त्रैण गुणों से युक्त होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)