श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.8.10 
तथा चिकीर्षमाणं तं सपत्‍न्यास्तनयं ध्रुवम् ।
सुरुचि: श‍ृण्वतो राज्ञ: सेर्ष्यमाहातिगर्विता ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
जब ध्रुव महाराज, जो एक बालक थे, अपने पिता की गोद में जाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब उनकी विमाता सुरुचि को उस बालक से बहुत ईर्ष्या हुई। उसने अत्यंत घमंड के साथ इस प्रकार बोलना प्रारंभ किया जिससे राजा भी सुन सकें।
 
जब ध्रुव महाराज, जो एक बालक थे, अपने पिता की गोद में जाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब उनकी विमाता सुरुचि को उस बालक से बहुत ईर्ष्या हुई। उसने अत्यंत घमंड के साथ इस प्रकार बोलना प्रारंभ किया जिससे राजा भी सुन सकें।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas