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श्लोक 4.7.52  |
तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि ।
ब्रह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान ने आगे कहा : जिसे उचित ज्ञान प्राप्त नहीं है, वह ब्रह्मा और शिव जैसे देवताओं को स्वतंत्र मानता है या वह यह भी सोचता है कि जीव भी स्वतंत्र हैं। |
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| भगवान ने आगे कहा : जिसे उचित ज्ञान प्राप्त नहीं है, वह ब्रह्मा और शिव जैसे देवताओं को स्वतंत्र मानता है या वह यह भी सोचता है कि जीव भी स्वतंत्र हैं। |
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