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श्लोक 4.7.47  |
स प्रसीद त्वमस्माकमाकाङ्क्षतां
दर्शनं ते परिभ्रष्टसत्कर्मणाम् ।
कीर्त्यमाने नृभिर्नाम्नि यज्ञेश ते
यज्ञविघ्ना: क्षयं यान्ति तस्मै नम: ॥ ४७ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु, हम आपके दर्शन के लिए प्रतीक्षारत थे क्योंकि हम वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार यज्ञ करने में असमर्थ रहे हैं। अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमसे प्रसन्न हों। आपके पवित्र नाम-कीर्तन से ही सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। हम आपके सामने अपना सिर झुकाकर आपको सादर प्रणाम करते हैं। |
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| हे प्रभु, हम आपके दर्शन के लिए प्रतीक्षारत थे क्योंकि हम वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार यज्ञ करने में असमर्थ रहे हैं। अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमसे प्रसन्न हों। आपके पवित्र नाम-कीर्तन से ही सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। हम आपके सामने अपना सिर झुकाकर आपको सादर प्रणाम करते हैं। |
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