श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.7.44 
विद्याधरा ऊचु:
त्वन्माययार्थमभिपद्य कलेवरेऽस्मिन्
कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथै: स्वै: ।
क्षिप्तोऽप्यसद्विषयलालस आत्ममोहं
युष्मत्कथामृतनिषेवक उद्वय‍ुदस्येत् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
विद्याधरों ने कहा: हे प्रभु, यह मानव शरीर सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए है, लेकिन आपकी बाहरी ऊर्जा के वश में होकर जीव अपनी आत्मा को शरीर और भौतिक ऊर्जा के रूप में गलत पहचानता है, और इसलिए, माया से प्रभावित होकर, वह भौतिक सुखों के माध्यम से खुश होना चाहता है। वह भ्रमित हो जाता है और हमेशा अस्थायी, भ्रमपूर्ण सुखों की ओर आकर्षित होता है। लेकिन आपकी दिव्य गतिविधियाँ इतनी शक्तिशाली हैं कि यदि कोई उनके श्रवण और कीर्तन में खुद को लगाता है, तो वह माया से मुक्त हो सकता है।
 
The Vidyadharas said: O Lord, this human body is meant for attaining the highest perfection, but under the influence of Your external power, the soul mistakenly considers itself to be the body and material power, and thus, under the influence of Maya, it wants to be happy through worldly pleasures. It becomes confused and is always attracted towards temporary Maya pleasures. But Your divine activities are so powerful that if one engages himself in listening to and singing about them, he can be freed from delusion.
तात्पर्य
जिस मानवीय साकार रूप को 'अर्थदा' कहा जाता है, वह विशिष्ट रूप मूर्त शरीरधारी आत्मा को अत्युच्च पूर्णता प्राप्त करने में उसकी भरपूर मदद करता है। प्रह्लाद महाराज ने कहा कि शरीर नश्वर है, फिर भी ये हमें जीवन में सर्वोच्च सिद्धियों का आशीर्वाद दे सकता है। निम्नतम से उच्चतम जीव रूप तक के क्रमिक विकास में मानव रूप एक महान वरदान है। परंतु माया इतनी प्रबल है कि इस मानवीय शरीर के इस महान वरदान को पाने के बावजूद, हम क्षणभंगुर भौतिक सुख-विलासों से प्रभावित हो जाते हैं और अपने जीवन के लक्ष्य को भूल जाते हैं। हम उन वस्तुओं से आकर्षित होते हैं जिनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस आकर्षण की शुरुआत ही अस्थायी शरीर है। जीवन की इस भयावह स्थिति में मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है - भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन और श्रवण करना: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। 'युष्मत्-कथामृत-निषेवकः' शब्द का अर्थ है 'जो लोग आपके आध्यात्मिक विषयों के अमृत का रसपान करते हैं।' दो वर्णनात्मक पुस्तकें हैं जो विशेष रूप से कृष्ण के शब्दों और कृत्यों से संबंधित हैं: भागवद-गीता कृष्ण द्वारा दिए गए निर्देश हैं, और श्रीमद् भागवतम वह पुस्तक है जिसमें कृष्ण और उनके भक्तों के बारे में विशेष रूप से विषय शामिल हैं। ये दोनों पुस्तकें कृष्ण के शब्दों का विशेष अमृत हैं। जो लोग इन दो वैदिक साहित्यों का प्रचार करने में संलग्न हैं, उनके लिए माया द्वारा हम पर थोपे गए भ्रामक सशर्त जीवन से बाहर निकलना बहुत आसान है। भ्रम यह है कि बद्ध आत्मा अपनी आध्यात्मिक पहचान को समझने की कोशिश नहीं करती है। वह अपने बाहरी शरीर में अधिक रुचि रखता है, जो केवल एक क्षणभंगुर है और जैसे ही समय निर्धारित किया जाएगा, समाप्त हो जाएगा। जब जीव को एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवास करना होता है, तो पूरा वातावरण बदल जाएगा। माया के प्रभाव में वह फिर से एक अलग वातावरण में संतुष्ट हो जाएगा। माया के इस जादू को आवरणात्मिका शक्ति कहा जाता है क्योंकि यह इतना प्रबल है कि जीव किसी भी घृणित स्थिति में संतुष्ट रहता है। भले ही वह मूत्र और मल के बीच में आंत या पेट के भीतर रहने वाले कीड़े के रूप में पैदा हुआ हो, फिर भी वह संतुष्ट है। यही माया का आवरण प्रभाव है। लेकिन मानवीय जीवन समझने का एक अवसर है, और यदि कोई इस अवसर को चूक जाता है, तो वह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। भ्रामक माया से बाहर निकलने का तरीका कृष्ण के विषयों में शामिल होना है। भगवान चैतन्य ने एक ऐसी प्रक्रिया की वकालत की जिससे हर कोई अपनी वर्तमान स्थिति में बिना बदलाव के बना रह सकता है, लेकिन कृष्ण के बारे में उचित आधिकारिक स्रोतों से बस सुनना होगा। भगवान चैतन्य ने सभी को कृष्ण की बात फैलाने की सलाह दी। उन्होंने सलाह दी, "तुम सभी आध्यात्मिक गुरु बनो। तुम्हारा कर्तव्य केवल इतना है कि तुम जिससे भी मिलो उससे कृष्ण के बारे में या कृष्ण द्वारा दिए गए निर्देशों के बारे में बात करना है।" इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस इसी उद्देश्य से कार्य कर रहा है। हम किसी से भी पहले अपना रुख बदलने और फिर हमारे पास आने के लिए नहीं कहते हैं। इसके बजाय, हम सभी को हमारे साथ आने और बस हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप करने के लिए आमंत्रित करते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि अगर कोई केवल कृष्ण के विषयों का जाप और श्रवण करता है, तो उसका जीवन बदल जाएगा; वह एक नई रोशनी देखेगा और उसका जीवन सफल होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)