श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.7.41 
अग्निरुवाच
यत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजा
हव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् ।
तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभि:
स्विष्टं यजुर्भि: प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
ग्निदेव ने कहा: हे नाथ, मैं तुम्हें सादर नमन करता हूँ, क्योंकि तुम्हारी ही कृपा से मैं प्रखर अग्नि की तरह तेजस्वी हूँ और यज्ञ में दी गई घी मिश्रित आहुतियाँ स्वीकार करता हूँ। यजुर्वेद में वर्णित पाँच तरह की आहुतियाँ तुम्हारी विभिन्न शक्तियाँ हैं और तुम्हारी पूजा पाँच तरह के वैदिक मंत्रों से की जाती है। यज्ञ का अर्थ ही तुम अर्थात् परम भगवान् है।
 
Agnidev said: O Lord, I offer my respectful obeisances unto You, for it is by Your grace that I am as effulgent as the blazing fire and I accept the offerings mixed with ghee offered in the yajna. The five types of oblations described in the Yajur Veda are Your various powers and You are worshipped with five types of Vedic mantras. The meaning of yajna is You, that is, the Supreme Lord.
तात्पर्य
भगवद्-गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यज्ञ का आयोजन भगवान विष्णु के लिए ही किया जाना चाहिए। भगवान विष्णु के हजारों श्रेष्ठ पारलौकिक नाम हैं जिनमें से एक नाम यज्ञ है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि सभी कार्य यज्ञ के सन्तोष के लिए किए जाने चाहिए यानी विष्णु के लिए; व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले सभी अन्य कार्य सिर्फ़ उसके बंधन का कारण बनते हैं। वेदों के अनुसार हर किसी को यज्ञ का आयोजन करना ही चाहिए। जैसा कि उपनिषदों में कहा गया है कि अग्नि, वेदी, शुभ पूर्णिमा, चार माह की अवधि जिसे चातुर्मास्य कहा जाता है, यज्ञ करने के लिए पशु और सोम नामक पेय आवश्यक हैं, जैसा कि वेदों में उल्लिखित और चार वर्णों से युक्त विशिष्ट स्तुतिगान भी ज़रूरी है। एक स्तुति निम्न प्रकार है: आश्रावयेति चतुरक्षरं अस्तु श्रौषड इति चतुरक्षरं यजेति द्वाभ्यां ये यजामाहः। श्रुति और स्मृति साहित्यों के अनुसार ये मन्त्र भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए ही हैं। भौतिक रूप से बंधन में जकड़े हुए और भौतिक सुखों से आसक्त लोगों के उद्धार के लिए नियमों का पालन करते हुए यज्ञों का आयोजन किया जाना चाहिए और समाज के चारों वर्गों में विभाजित किया जाना चाहिए और आध्यात्मिक जीवन की भी शुरुआत करनी चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि विष्णु को बलि चढ़ाने से व्यक्ति धीरे-धीरे मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इस तरह, जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवान विष्णु को खुश करना है। यही यज्ञ है। जो कोई भी कृष्ण भावना में रहता है, उसने अपना जीवन कृष्ण को खुश करने के लिए समर्पित कर दिया है, वह सभी प्रकार के विष्णु रूपों का मूल है और दैनिक पूजा और प्रसाद अर्पित करके, वह यज्ञ करने वाला सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति बन जाता है। श्रीमद्-भागवतम् में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कलि युग में यज्ञ या बलिदान का सफलतापूर्वक आयोजन किया जाने वाला सिर्फ़ यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैः है: सर्वश्रेष्ठ प्रकार का बलिदान है हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे रामा, हरे रामा, रामा रामा, हरे हरे का जाप करना। यह यज्ञ भगवान चैतन्य के रूप से पहले किया जाता है, क्योंकि अन्य यज्ञ भगवान विष्णु के रूप में पहले किए जाते हैं। ये अनुशंसाएँ श्रीमद्-भागवतम् के ग्यारहवें सर्ग में पाई जाती हैं। इसके अलावा, इस यज्ञ आयोजन से यह पुष्टि होती है कि भगवान चैतन्य महाप्रभु स्वयं विष्णु हैं। जैसा कि भगवान विष्णु बहुत पहले दक्ष यज्ञ में प्रकट हुए थे, ठीक उसी तरह भगवान चैतन्य हमारे संकीर्तन-यज्ञ को स्वीकार करने के लिए इस युग में प्रकट हुए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)