श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.7.41 
अग्निरुवाच
यत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजा
हव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् ।
तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभि:
स्विष्टं यजुर्भि: प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
ग्निदेव ने कहा: हे नाथ, मैं तुम्हें सादर नमन करता हूँ, क्योंकि तुम्हारी ही कृपा से मैं प्रखर अग्नि की तरह तेजस्वी हूँ और यज्ञ में दी गई घी मिश्रित आहुतियाँ स्वीकार करता हूँ। यजुर्वेद में वर्णित पाँच तरह की आहुतियाँ तुम्हारी विभिन्न शक्तियाँ हैं और तुम्हारी पूजा पाँच तरह के वैदिक मंत्रों से की जाती है। यज्ञ का अर्थ ही तुम अर्थात् परम भगवान् है।
 
ग्निदेव ने कहा: हे नाथ, मैं तुम्हें सादर नमन करता हूँ, क्योंकि तुम्हारी ही कृपा से मैं प्रखर अग्नि की तरह तेजस्वी हूँ और यज्ञ में दी गई घी मिश्रित आहुतियाँ स्वीकार करता हूँ। यजुर्वेद में वर्णित पाँच तरह की आहुतियाँ तुम्हारी विभिन्न शक्तियाँ हैं और तुम्हारी पूजा पाँच तरह के वैदिक मंत्रों से की जाती है। यज्ञ का अर्थ ही तुम अर्थात् परम भगवान् है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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