सिद्धा ऊचु:
अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां
मनोवारण: क्लेशदावाग्निदग्ध: ।
तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं
न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्न: ॥ ३५ ॥
अनुवाद
सिद्धों ने स्तुति की: हे भगवन्, जंगल की आग से झुलसकर जब हाथी नदी में प्रवेश करता है, तो उसे सारी पीड़ा भुलाकर आनंद का अनुभव होता है। उसी तरह, हे प्रभु, हमारे मन भी आपकी दिव्य लीलाओं की अमृत-नदी में सराबोर होकर उस परम आनंद का अनुभव करते हैं, जो कि ब्रह्म में विलीन होने के सुख के समान है।
The Siddhas prayed: O Lord, our minds are like the elephant which, when troubled by a forest fire, can forget all its sufferings by entering the river. In the same way, our minds are also immersed in the nectar-river of your divine pastimes and want to remain in such divine bliss forever, which is equal to the bliss of being one with the Supreme Brahman.
तात्पर्य
यह कथन सिद्धों का है, जो सिद्धलोक के निवासी हैं, जहां आठ प्रकार की भौतिक पूर्णताएं पूरी होती हैं। सिद्धलोक के निवासी योग-सिद्धियों के आठ प्रकारों पर पूरा अधिकार रखते हैं, लेकिन उनके कथन से प्रतीत होता है कि वे शुद्ध भक्त हैं। वे हमेशा भगवान के लीलाओं के श्रवण की अमृत नदी में विलीन हो जाते हैं। भगवान की लीलाओं के श्रवण को कृष्ण-कथा कहा जाता है। इसी तरह, प्रह्लाद महाराज का एक कथन है कि जो लोग हमेशा भगवान के लीलाओं के वर्णन के अमृत सागर में विलीन रहते हैं, वे मुक्त हैं और उन्हें जीवन की भौतिक दशा का कोई भय नहीं है। सिद्ध कहते हैं कि एक साधारण व्यक्ति का मन चिंताओं से भरा होता है। जंगल की आग से पीड़ित होने वाले हाथी का उदाहरण दिया गया है जो राहत के लिए नदी में प्रवेश करता है। यदि इस भौतिक अस्तित्व की जंगल की आग में पीड़ित व्यक्ति केवल भगवान की लीलाओं के वर्णन की अमृतमयी नदी में प्रवेश करेंगे, तो वे भौतिक अस्तित्व के सभी कष्टों को भूल जाएंगे। सिद्ध फलदायी कार्यों की परवाह नहीं करते हैं, जैसे यज्ञ करना और अच्छे परिणाम प्राप्त करना। वे बस भगवान की लीलाओं की पारलौकिक चर्चा में विलीन हो जाते हैं। इससे वे धार्मिक या अधर्मी कार्यों की चिंता किए बिना पूर्ण रूप से खुश हो जाते हैं। जो लोग हमेशा कृष्ण चेतना में रहते हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के धार्मिक या अधार्मिक यज्ञ या गतिविधियों को करने की आवश्यकता नहीं है। कृष्ण चैतन्य स्वयं पूर्ण है, क्योंकि इसमें वैदिक शास्त्रों में प्रशंसित सभी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥