श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.7.31 
ब्रह्मोवाच
नैतत्स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ
भेदग्रहै: पुरुषो यावदीक्षेत् ।
ज्ञानस्य चार्थस्य गुणस्य चाश्रयो
मायामयाद्वय‍‌तिरिक्तो मतस्त्वम् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा: हे भगवान, अगर कोई इंसान आपको ज्ञान प्राप्त करने की अलग-अलग विधियों के जरिए जानने की कोशिश करे, तो वो आपके व्यक्तित्व और शाश्वत रूप को नहीं समझ सकता। आपका स्थान हमेशा भौतिक सृष्टि से परे है, जबकि आपको समझने के प्रयास, लक्ष्य और साधन सब भौतिक और काल्पनिक हैं।
 
ब्रह्माजी ने कहा: हे भगवान, अगर कोई इंसान आपको ज्ञान प्राप्त करने की अलग-अलग विधियों के जरिए जानने की कोशिश करे, तो वो आपके व्यक्तित्व और शाश्वत रूप को नहीं समझ सकता। आपका स्थान हमेशा भौतिक सृष्टि से परे है, जबकि आपको समझने के प्रयास, लक्ष्य और साधन सब भौतिक और काल्पनिक हैं।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas