दृष्ट्वा संज्ञपनं योगं पशूनां स पतिर्मखे ।
यजमानपशो: कस्य कायात्तेनाहरच्छिर: ॥ २४ ॥
अनुवाद
तब वीरभद्र ने यज्ञशाला में लकड़ी की बनी युक्ति (करनी) देखी जिसका उपयोग पशुओं को मारने के लिए किया जाता था। उसने इस सुविधा का लाभ उठाकर दक्ष का सिर काट दिया।
Then Veerbhadra saw a wooden tool (Karni) in the sacrificial altar with which animals were slaughtered. He used it to cut off Daksha's head.
तात्पर्य
इस संबंध में, यह ध्यान देने योग्य है कि बलि में जानवरों को मारने के लिए उपयोग किया जाने वाला उपकरण उनके मांस को खाने की सुविधा के लिए नहीं बनाया गया था। हत्या का उद्देश्य विशेष रूप से वैदिक मंत्र की शक्ति से बलिदान किए गए जानवर को एक नया जीवन देना था। वैदिक मंत्रों की शक्ति का परीक्षण करने के लिए जानवरों की बलि दी जाती थी; यज्ञ मंत्र की परीक्षा के रूप में किए जाते थे। आधुनिक युग में भी, फिजियोलॉजी प्रयोगशाला में जानवरों के शरीर पर परीक्षण किए जाते हैं। इसी तरह, बलिदान में वेद मंत्रों का सही उच्चारण कर रहे हैं या नहीं, इसका परीक्षण मैदान में बलिदान करके किया जाता है। कुल मिलाकर, इस प्रकार बलिदान किए गए जानवर बिल्कुल भी हारे नहीं थे। कुछ बूढ़े जानवरों की बलि दी जाती, लेकिन अपने पुराने शरीर के बदले में उन्हें दूसरे, नए शरीर मिलते। यही वैदिक मंत्रों की परीक्षा थी। वीरभद्र ने लकड़ी के उपकरण से जानवरों की बलि देने के बजाय, सभी को आश्चर्यचकित करते हुए दक्ष का तुरंत सिर काट दिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥