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bhagavat 4.5.2: इस प्रकार अत्यधिक क्रोधित होकर, शिवजी ने अपने दाँतों से होठों को दबाते हुए अपने सिर की जटाओं से एक लट खींच ली। वह लट बिजली या आग की तरह जलने लगी थी। वे एक पागल की तरह हँसते हुए तुरंत खड़े हो गए और उस लट को पृथ्वी पर फेंक दिया।   |   bhagavat अध्याय 4.5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.5.2 
क्रुद्ध: सुदष्टौष्ठपुट: स धूर्जटि-
र्जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम् ।
उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन्
गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अत्यधिक क्रोधित होकर, शिवजी ने अपने दाँतों से होठों को दबाते हुए अपने सिर की जटाओं से एक लट खींच ली। वह लट बिजली या आग की तरह जलने लगी थी। वे एक पागल की तरह हँसते हुए तुरंत खड़े हो गए और उस लट को पृथ्वी पर फेंक दिया।
 
Being thus greatly enraged, Shiva bit his lips with his teeth and immediately plucked out a lock of matted hair from his head, which began to burn like lightning or fire. He immediately stood up laughing like a madman and threw that lock of hair on the ground.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)