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श्लोक 4.5.19  |
जुह्वत: स्रुवहस्तस्य श्मश्रूणि भगवान् भव: ।
भृगोर्लुलुञ्चे सदसि योऽहसच्छ्मश्रु दर्शयन् ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| वीरभद्र ने आग में अपने हाथों से आहुति अर्पित कर रहे भृगुमुनि की मूछें नोच लीं। |
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| वीरभद्र ने आग में अपने हाथों से आहुति अर्पित कर रहे भृगुमुनि की मूछें नोच लीं। |
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