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bhagavat 4.5.15: उन्होंने यज्ञ के लिए बनाए गए सभी पात्र तोड़ दिए और उनमें से कुछ लोगों ने यज्ञ-अग्नि को बुझाना शुरु कर दिया। कुछ ने यज्ञस्थल की सीमांकन की हुई मेखलाएँ तोड़ दीं और कुछ ने यज्ञस्थल में पेशाब कर दिया।   |   bhagavat अध्याय 4.5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.5.15 
रुरुजुर्यज्ञपात्राणि तथैकेऽग्नीननाशयन् ।
कुण्डेष्वमूत्रयन् केचिद्‌बिभिदुर्वेदिमेखला: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने यज्ञ के लिए बनाए गए सभी पात्र तोड़ दिए और उनमें से कुछ लोगों ने यज्ञ-अग्नि को बुझाना शुरु कर दिया। कुछ ने यज्ञस्थल की सीमांकन की हुई मेखलाएँ तोड़ दीं और कुछ ने यज्ञस्थल में पेशाब कर दिया।
 
They broke all the utensils of the yajna and some of them started extinguishing the yajna fire. Some of them even broke the demarcation lines of the yajna place and some even urinated in the yajna place.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)