बह्वेवमुद्विग्नदृशोच्यमाने
जनेन दक्षस्य मुहुर्महात्मन: ।
उत्पेतुरुत्पाततमा: सहस्रशो
भयावहा दिवि भूमौ च पर्यक् ॥ १२ ॥
अनुवाद
जब लोगों के बीच आपस में बातचीत हो रही थी, उसी समय दक्ष को हर दिशा से, धरती और आकाश से, अशुभ संकेत दिखाई पड़ने लगे।
While everyone was talking to each other, Daksha started seeing inauspicious signs (bad omens) from all directions, from the earth and from the sky.
तात्पर्य
इस छंद में दक्ष को महात्मा बताया गया है। शब्द महात्मा पर भिन्न-भिन्न प्रकार से अनेक टीकाकारों द्वारा टिप्पणी की गई है। वीर राघव आचार्य ने संकेत किया है कि शब्द महात्मा का अर्थ होता है "हृदय में स्थिर", अर्थात दक्ष इतने दृढ़ हृदय के थे कि जब उनकी प्रिय पुत्री प्राण त्यागने के लिए भी तैयार हो गई तो भी वह स्थिर और अविचल रहे। किन्तु इतने दृढ़ हृदय होने के बावजूद भी वे उस काले विशाल दैत्य द्वारा उत्पन्न किए गए अनेक उपद्रवों को देख कर परेशान हो गए। इस संबंध में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने टिप्पणी की है कि यदि कोई महात्मा कहलाता है, किसी महान आत्मा, तो जब तक महात्मा के लक्षण प्रदर्शित नहीं करता तब तक उसे दुरात्मा अर्थात निम्न आत्मा ही समझा जाना चाहिए। भगवद गीता (9.13) में शब्द महात्मा भगवान के पवित्र भक्त का वर्णन करता है: महात्मानस्तुमां पार्थ दैवीम्प्रकृतिमाश्रिताः एक महात्मा हमेशा परमेश्वर के व्यक्तित्व के आंतरिक शक्ति के सान्निध्य में रहता है, और इस प्रकार दक्ष जैसा दुर्व्यवहारी व्यक्ति महात्मा कैसे हो सकता है? माना जाता है कि एक महात्मा में अर्धदेवों के सभी अच्छे गुण होने चाहिए और इस प्रकार, उन गुणों के अभाव में दक्ष को महात्मा नहीं कहा जा सकता, इसकी बजाय उन्हें दुरात्मा अर्थात निम्न आत्मा कहा जाना चाहिए। शब्द महात्मा का उपयोग दक्ष के गुणों का वर्णन करने में व्यंग्य के रूप में किया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥