श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.31.15 
यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वार:
पुनश्च तस्मिन्प्रविशन्ति काले ।
भूतानि भूमौ स्थिरजङ्गमानि
तथा हरावेव गुणप्रवाह: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
वर्षा ऋतु में सूर्य से जल उत्पन्न होता है, और समय के दौरान, गर्मियों के मौसम में, वही जल सूर्य द्वारा पुन: अवशोषित किया जाता है। इसी तरह, सभी जीवित प्राणी, चलते-फिरते और स्थिर, पृथ्वी से उत्पन्न होते हैं, और फिर, कुछ समय बाद, वे सभी धूल के रूप में पृथ्वी पर लौट आते हैं। इसी तरह, हर चीज भगवान से निकलती है, और समय के साथ सब कुछ फिर से उन्हीं में प्रवेश कर जाता है।
 
During the rainy season, water is produced from the sun and in due course of time, i.e. during the summer season, the same water is again absorbed by the sun. Similarly, all animate and inanimate beings are produced from this earth and after some time they again merge into the earth in the form of dust. Similarly, every object is produced from Shri Bhagwan and in due course of time it again gets absorbed in Him.
तात्पर्य
अपने ज्ञान की कमी के कारण, अव्यक्तिवादी दार्शनिक यह समझ नहीं पाते की किस तरह से सभी कुछ सर्वोच्च व्यक्ति से उत्पन्न होता है और फिर पुनः उन्हीं में विलीन हो जाता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.40) में पुष्टि की गई है:

यस्याः प्रभा प्रभवतो जगत-अंड-कोटि-

कोटिष्व अशेष-वसुधा-दि-विभूति-भिन्नम्

तद् ब्रह्म निष्कलम अनंत अशेष-भूतम्

गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामी

कृष्ण के शरीर से परालौकिक किरणें निकलती हैं, और उन किरणों के भीतर, जो ब्रह्म का तेज होता है, सभी कुछ मौजूद होता है। भगवद गीता (9.4) में इसकी पुष्टि की गई है: मत- स्थाणि सर्व-भूतानि। हालाँकि कृष्ण व्यक्तिगत रूप से हर जगह उपस्थित नहीं हैं, पर उनकी ऊर्जा सभी सृजन का कारण है। संपूर्ण ब्रह्मांड दिव्य अभिव्यक्ति, कृष्ण की ऊर्जा के प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं है।

इस पद में दिए गए दो उदाहरण काफी ज्वलंत हैं। बारिश के मौसम में, बारिश, पृथ्वी पर सब्जियों के उत्पादन को फिर से जीवंत करके, मनुष्य और जानवरों को जीवित रहने की ऊर्जा प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। जब बारिश नहीं होती है, तो भोजन की कमी हो जाती है, और मनुष्य और जानवर बस मर जाते हैं। सभी सब्जियां, साथ ही साथ चलती-फिरती जीवित संस्थाएँ, मूल रूप से पृथ्वी के उत्पाद हैं। वे पृथ्वी से आते हैं, और फिर वे पुनः पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। इसी तरह, समस्त भौतिक ऊर्जा कृष्ण के शरीर से उत्पन्न होती है, और ऐसे समय में पूरे ब्रह्मांड को देखा जा सकता है। जब कृष्ण अपनी ऊर्जा को समाप्त कर देते हैं, तो सब कुछ गायब हो जाता है। इसे ब्रह्म-संहिता (5.48) में अलग तरीके से समझाया गया है:

यस्या एक-निश्वसिता-कालम् अथावलम्ब्य

जीवंति लोम-विलाजा जगद-अंड-नाथाः

विष्णुः महान् स इह यस्य कला-विशेषः

गोविंदम् आदि-पुरुषं तम् अहं भजामी

यह संपूर्ण भौतिक सृष्टि भगवान श्रीकृष्ण के शरीर से आती है और विनाश के समय फिर से उन्हीं में प्रवेश कर जाती है। सृजन और विघटन की यह प्रक्रिया महा विष्णु की साँस लेने से संभव होती है जो कि कृष्ण का केवल एक पूर्ण अंश है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)