यस्याः प्रभा प्रभवतो जगत-अंड-कोटि-
कोटिष्व अशेष-वसुधा-दि-विभूति-भिन्नम्
तद् ब्रह्म निष्कलम अनंत अशेष-भूतम्
गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामी
कृष्ण के शरीर से परालौकिक किरणें निकलती हैं, और उन किरणों के भीतर, जो ब्रह्म का तेज होता है, सभी कुछ मौजूद होता है। भगवद गीता (9.4) में इसकी पुष्टि की गई है: मत- स्थाणि सर्व-भूतानि। हालाँकि कृष्ण व्यक्तिगत रूप से हर जगह उपस्थित नहीं हैं, पर उनकी ऊर्जा सभी सृजन का कारण है। संपूर्ण ब्रह्मांड दिव्य अभिव्यक्ति, कृष्ण की ऊर्जा के प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं है।
इस पद में दिए गए दो उदाहरण काफी ज्वलंत हैं। बारिश के मौसम में, बारिश, पृथ्वी पर सब्जियों के उत्पादन को फिर से जीवंत करके, मनुष्य और जानवरों को जीवित रहने की ऊर्जा प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। जब बारिश नहीं होती है, तो भोजन की कमी हो जाती है, और मनुष्य और जानवर बस मर जाते हैं। सभी सब्जियां, साथ ही साथ चलती-फिरती जीवित संस्थाएँ, मूल रूप से पृथ्वी के उत्पाद हैं। वे पृथ्वी से आते हैं, और फिर वे पुनः पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। इसी तरह, समस्त भौतिक ऊर्जा कृष्ण के शरीर से उत्पन्न होती है, और ऐसे समय में पूरे ब्रह्मांड को देखा जा सकता है। जब कृष्ण अपनी ऊर्जा को समाप्त कर देते हैं, तो सब कुछ गायब हो जाता है। इसे ब्रह्म-संहिता (5.48) में अलग तरीके से समझाया गया है:
यस्या एक-निश्वसिता-कालम् अथावलम्ब्य
जीवंति लोम-विलाजा जगद-अंड-नाथाः
विष्णुः महान् स इह यस्य कला-विशेषः
गोविंदम् आदि-पुरुषं तम् अहं भजामी
यह संपूर्ण भौतिक सृष्टि भगवान श्रीकृष्ण के शरीर से आती है और विनाश के समय फिर से उन्हीं में प्रवेश कर जाती है। सृजन और विघटन की यह प्रक्रिया महा विष्णु की साँस लेने से संभव होती है जो कि कृष्ण का केवल एक पूर्ण अंश है।
